Sunday, September 19, 2021

सूरजमुखी


🌻सूरजमुखी🌻

 


 प्रेम… एक शब्द …जिसकी परिभाषा कदाचित हम में से प्रत्येक के लिए पृथक होगी…यद्यपि प्रेम को समझ पाना  सरल नही....फिर भी कई नाम ...कई चेहरे...कई चित्र-चलचित्र...प्रेम की अनुभूतियों से सर्वदा जुड़े हुए...प्रेम के पर्याय से प्रतीत होते हैं..      

बचपन मे पढ़ी हुई बाल पत्रिका 'नंदन' की एक कहानी ..मेरे भी मन पर प्रेम की एक अमिट छाप अंकित कर गयी थी…'वृंदा' की कहानी..


वृंदा..एक अनाथ लड़की ..संसार मे जिसका कोई न था..एक निर्जन वन में अकेली..प्रकृति ही जिसकी धात्री.....चारों ओर बिखरी हरीतिमा,फूल और पंछी जिसके संगी साथी थे...यूं तो बदलती ऋतुओं के सिवा...सब कुछ स्थिर था - वृंदा का एकांत..उसकी नीरवता..और ये अनंत आकाश...किंतु वृंदा के आकर्षण का केंद्र बिंदु था हर सुबह उस नीलाभ पथ पर उतरने  वाला एक स्वर्णरथ..जिसकी आभा सारे जग को सुदीप्त कर देती है..जिसकी ऊष्मा हर जड़ चेतन में जीवन रोप जाती है..

कौन है वो आगंतुक सा ...पंछी चहचहा कर जिसके आगमन की घोषणा करते हैं….मृदु कोपलें भी अपनी नन्ही बाहें पसार कर जिस पर अपना स्नेह लुटाती है….


कौन था वो…. भोर होते ही रवि-रश्मियाँ वृंदा को किसी मोह पाश में बांध कर एक प्रस्तर-खण्ड पर बिठा जाती थीं.. और वो उस पथिक की स्वर्णमयी यात्रा के क्षण क्षण में लीन सी हो जाती.. अविराम ..अपलक उसे निहारते रहना ..दिनचर्या से जाने कब उसकी नियति में परिवर्तित हो गया ...जाने कब सूरज को अपना सर्वस्व मान कर इस संसार से ही नही वरन स्वस्तित्व से भी विस्मृत हो चुकी वृंदा को भी इसकी अनुभूति न हो सकी..एक पूरी आयु उस सुनहरी-पीली आंच में तपती रही..सब स्वर्णमयी..सब प्रेममयी..


इतना पढ़ कर मैं स्वयं वृंदा की प्रेमानुभूतियों में खो चुकी थी..किंतु सोच में थी..कि उस निर्मोही पथिक की दृष्टि भी क्या एक पल को पड़ी होगी उस बावरी पर..!! क्या एक क्षण के किसी भाग भर को भी वृंदा का प्रेम उस तपन को शीतल कर पाया होगा..!!!


पीली ही हो चली देह भी... मन भी..धरती पर सूरज का हर फेरा.. शनः शनः एक तरुणी 'वृंदा' को 'वृद्धा' मे रूपांतरित करता रहा.. किसी ध्यानमग्न साध्वी सी वृंदा वहीं ..उस पाषाण खंड पर बैठी स्वयं पाषाण सी हो चली..उसी प्रेम में जलते-सिकते हुए एक दिन वो देह भी प्रकृति में विलीन हो गयी… 


किसी का होना और न होना बहुत अर्थपूर्ण होता है...हम होते हैं तो स्वयं को उपेक्षित सा अनुभव करते हैं..लगता है जैसे किसी के ध्यान में ही नही हमारा अस्तिव..परंतु कौन जाने...हमारे न  होने पर ये फूल पत्ते…वर्षा की बूंदें ..धरती -आकाश सब हमारी स्मृतियों में विह्वल हो,.हमे खोजते  हों.. 


कदाचित प्रकृति को भी वह अनुरागिनी वृंदा अपने ही किसी हिस्से सी लगी हो...जिसकी रिक्तता उसे उद्वेलित कर रही हो...

जिस स्थान पर वृंदा देह से मुक्त हुई...वहां स्वतः ही एक नन्हा

पौधा उग आया..जिसमे सूरज की ही स्वर्णिम छवि वाले फूल उगने लगे..जिनकी पीली पीली परस्पर अतिव्याप्त पंखुड़ियों पर सूर्य- किरणों की सी आभा थी….


 अप्रतिबंधित समर्पित प्रेम के पर्याय से ये सूरजमुखी के फूल आज भी अपने मुस्काने से मुरझाने तक सूरज को अपलक निहार कर निहाल रहते हैं..सूरज की दिशा ही जिनकी दृष्टि का निर्धारण करती है….. जिनके रूप में वृंदा चिर प्रतीक्षारत है..उसी निर्मोही..निर्मम सूरज के लिए…



जी..वृंदा का जीवन समाप्त हुआ.. परन्तु उसका प्रेम नही ..एक अंतहीन प्रतीक्षा  ..उसे अमर कर गयी….सूरजमुखी बना गयी.. 


इस क्षण जब मैं ये लिख रही हूँ ...सूरजमुखी का मर्म फिर मुझे छू रहा  है….भूपिंदर सिंह द्वारा गाया गया ये गीत फिर कहीं अंतर में गूंज रहा है..

" सूरजमुखी..तेरा प्यार अनोखा है… 

हर सुबह को खिलना है…

हर शाम को मुरझाना है…

सूरज ने क्या तेरे ...इस मर्म को जाना है…."


और मैं विवश सी हूँ…स्वयं के भीतर उगते सूरज और सिर उठाते सूरजमुखी को अभिव्यक्त होने देने के लिए….



Wednesday, September 15, 2021

ये बारिशें भी न..


 फिर आज ..

झर रहा है आकाश ..

साँझ ढले से ही..

कभी मुसकान सी फुहारें फेंकता....

तो कभी..धीमा धीमा ..

सिसक सिसक कर..

ये बाहर और भीतर के मौसमों की मिली भगत..

कुछ समझ में नहीं आती...

वही सब कुछ हरा हरा ...

भीतर भी बाहर भी..

धुला धुला..नया नया सा..

यादों के परदेस से

ठंडी हवाएं..

प्यारे मेहमान सी...

मुट्ठी में बंद ..कुछ सीली सी चिट्ठियाँ...

जिनकी लिखावट ...

जाने कब धुंधली कर गयीं

ये..वक़्त- बेवक्त की बारिशें..

मन की गलियों गलियों...

भावनाओं की ढलानों पे ..

बस बहा चला जाता बारिशों का पानी...

जाने कितनी...कागज की नावें ...

डूबती -उभरती...

धुंधली धुंधली सी......

और कभी ये बारिशें..चुप चाप ...

रात के किसी पहर..दबे पांव......

किसी चोर सी...चली आती हैं

मेरे ख़ाली हुए खजाने चुराने...

या शायद.....शायद ..बस सपने भिगोने..

उन्हें सींचने आती हैं...

तभी तो.....

हर सुबह....सिराहने पर ....

गीली मिटटी की खुशबू सी आती है ..

और....

तकिये के कोने भी..

सीले हुए मिलते हैं......................है न...!!!!

Tuesday, September 14, 2021

हिंदी दिवस पर विशेष - 'प्रतीक' (कविता)


हिंदी दिवस -और जानें
https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8

' प्रतीक '


मेरी कथा , तेरी व्यथा

एक जैसी जीवन गाथा

समय के पन्ने,नियति की स्याही  और ..

लिखने वाला एक विधाता


कुछ शब्द, कुछ वाक्य

कहीं  कविता, कहीं निबंध

गीत, काव्य और छंद

वक्र,सरल,आड़ी तिरछी रेखाएँ

देतीं शब्दों को आकार

सब चिन्ह - प्रतीक समझाते

जीवन का आधार        


अल्पविराम, बताता

'अभी शेष' है  नाता,,,

......बिन्दुओं की कतार........

दे भावों को  विस्तार

विस्मय की परिभाषा।

दुख-सुख

आशा और निराशा...!!!





अनगिनत प्रश्न चिन्हों के बोझ ?????

जाने कैसी खोज???


अनगिनत विराम ।।।।।।

फिर भी ....एक चक्र

अविरल ...अविराम..।।।।




अक्षर अक्षर..चिन्ह चिन्ह

इच्छा उसकी छिपी है

रंगबिरंगी स्याही वाली

अनोखी एक लिपि है

समझ ..सोच..सीख ..सजग हो

कर आकलन..

ज्ञान बढ़ा ..इस भाषा का..

पढ़ ये व्याकरण...

देख......कठिन है 

समझ .... सरल है

चुन ले  .....  जो कठिन है

बाँट दे....जो सरल है ................


आप सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ 💐🙂


Monday, September 13, 2021

लेखन और अनुशासन



लेखन...यानी  मानवीय विचारों एवं अनुभूतियों के संचार का लिपिबद्ध साधन...बोलना और लिखना एक दूसरे से काफी भिन्न हो सकते हैं जिसमे आश्चर्य नहीं..वस्तुतः यह एक सरलता से जटिलता की ओर जाने वाली प्रक्रिया है। लिखना बोलने से अधिक महत्वपूर्ण होता है..तुलनात्मक रूप से लिखते समय जहां एक तरफ हमारा मस्तिष्क कहीं अधिक सक्रिय होता है  वहीं दूसरी ओर हमें अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है।


लेखन के बारे में सबसे कठिन हिस्सा, वास्तव में लिखना आरम्भ करने के लिए स्वयं को तत्पर करना है। 

अधिकांश लेखक आमतौर पर लिखना प्रारम्भ करने में नकारात्मकता का अनुभव करते है परंतु लिखना समाप्त कर लेने पर  इसे पसंद करते हैं।  कुछ लोगों के ऐसा सोचने का एक मूल कारण यह है कि वे असफल होने से डरते हैं।  वह यह सोचकर स्वयं पर अनावश्यक दबाव भी डालते कि उन्हें जो कुछ भी लिखें वह शानदार होना चाहिए।


 तथ्य यह है कि कोई भी प्रामाणिक रूप से सम्पूर्ण नही हो सकता  हर किसी में दोष या खामियां होती हैं और खामियां होना ही अधिक से अधिक लिखने के कारण के रूप में स्वयं में पर्याप्त है। लिखने का अभ्यास ही आपको बेहतर बना सकता है । 

लेखन के लिए  अनुशासन एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता हैअनुशासन रखने से कोई भी स्पष्ट रूप से सोचने में सक्षम होता है।  यह एक लेख के विवरण और तथ्यों को प्रस्तुत करने के तरीकों को सामने लाने में भी मदद करता है।


एक अनुशासित लेखक स्पष्ट रूप से सोचने और अपनी सांसारिक चिंताओं से परे जा कर जब उत्पादन पर ध्यान केंद्रित  कर पाता है 


लेखन का विषय निर्धारण किसी अपरिचित चौराहे पर खड़े हो कर किसी एक दिशा की ओर कदम बढ़ाने जैसा ही है..हर तरफ विषय ही विषय हैं..आवश्यकता है अपनी रुचि के साथ साथ लक्षित पाठक के आधार पर सही विषय का निश्चय किये जाने की । अनुशासन इसे हमारे लिए आसान बना देता है…


आसान और सुविधाजनक छोटे टुकड़ों में लेख के बारे में सोचने के लिए हमें खुद को अनुशासित करना चाहिए।  प्रत्येक विचार को एक अनुच्छेद के रूप में ले कर एक सरल एवं चरणबद्ध  रूपरेखा तैयार की जा सकती है जो हमारे विषय को संपूर्णता प्रदान करेगा।


 बेहतर परिणाम के लिए संपादित करने में शीघ्रता से बचने के लिए भी अनुशासित रहना आवश्यक है --कम से कम अभी तो नहीं 🙂

उत्तम लेखन की कुंजी विचारों को प्रवाहित होने देना है।  संपादन बाद के भाग में आना चाहिए। संपादन लेखन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, कम से कम उस चरण में जहां विचारों को वास्तव में निर्बाध प्रवाहित करना होता है 


इस सब के साथ ही लेख को फिर से पढ़ने और समीक्षा करने के लिए तथा एक अल्पविराम के अनुशासित रहना भी संतोषजनक परिणाम के महत्वपूर्ण है  एक अल्पान्तर के पश्चात लेख पर वापस आना किसी को भी इसे नए सिरे से देखने में सक्षम बनाता है।



 





संक्षेप में, अनुशासन किसी भी कार्य को व्यवस्थित तरीके से पूर्ण करने में सहायक है ..लेखन के लिए भी ..व्यवस्थित ओर अनुशासित रहें..और बेहतर लिखें 🙂🙏

Sunday, September 12, 2021

सदानीरा

 

ॐ श्री गणेशाय नमः


 ये पहला blog है मेरा....कोई अनुभव नही है... बस इस बात से अनभिज्ञ नही हूँ कि मेरी और आपकी ...हमारी अनुभूतियाँ साझी हैं.....🙂

सदानीरा... ये नाम बड़ा सुना हुआ है ..गूगल पर सर्च करें तो अनेको कविताएँ..कहानियाँ मिल जाएंगी इस शीर्षक की.... मेरे लिए भी सदानीरा का वही अर्थ है.. जो गुणीजनों द्वारा अब तक बताया गया है..

सदानीरा.... नदी...सदा नीर भरी....कभी न सूखने वाली.... हर अंतर में बहने वाली...भावनाओं...अनुभूतियों ..और स्मृतियों की सदानीरा....

अन्तर्मन में बर्फ से जमे हुए ..कई मौसम अक्सर पिघला करते हैं और भीतर भीतर  रिसा करती है एक सदानीरा... ...साल भर जलपूर्ण....सदा प्रवाहित... सदानीरा......
इस निरंतर प्रवाह की कोई धारा जब अंतर्वेदना के तटबंध तोड़ती है...कुछ स्वयं ही छलक आता है आंखों के कोरों से..कुछ कविता सा...किसी कहानी ...या बस किसी ख़याल जैसा कुछ.... !!

सदानीरा.... नदी...सदा नीर भरी....कभी न सूखने वाली.... हर अंतर में बहने वाली...भावनाओ...अनुभूतियों ..

सूरजमुखी

🌻 सूरजमुखी🌻     प्रे म… एक शब्द …जिसकी परिभाषा कदाचित हम में से प्रत्येक के लिए पृथक होगी…यद्यपि प्रेम को समझ पाना  सरल नही....फिर भी कई ...