🌻सूरजमुखी🌻
प्रेम… एक शब्द …जिसकी परिभाषा कदाचित हम में से प्रत्येक के लिए पृथक होगी…यद्यपि प्रेम को समझ पाना सरल नही....फिर भी कई नाम ...कई चेहरे...कई चित्र-चलचित्र...प्रेम की अनुभूतियों से सर्वदा जुड़े हुए...प्रेम के पर्याय से प्रतीत होते हैं..
बचपन मे पढ़ी हुई बाल पत्रिका 'नंदन' की एक कहानी ..मेरे भी मन पर प्रेम की एक अमिट छाप अंकित कर गयी थी…'वृंदा' की कहानी..
कौन है वो आगंतुक सा ...पंछी चहचहा कर जिसके आगमन की घोषणा करते हैं….मृदु कोपलें भी अपनी नन्ही बाहें पसार कर जिस पर अपना स्नेह लुटाती है….
कौन था वो…. भोर होते ही रवि-रश्मियाँ वृंदा को किसी मोह पाश में बांध कर एक प्रस्तर-खण्ड पर बिठा जाती थीं.. और वो उस पथिक की स्वर्णमयी यात्रा के क्षण क्षण में लीन सी हो जाती.. अविराम ..अपलक उसे निहारते रहना ..दिनचर्या से जाने कब उसकी नियति में परिवर्तित हो गया ...जाने कब सूरज को अपना सर्वस्व मान कर इस संसार से ही नही वरन स्वस्तित्व से भी विस्मृत हो चुकी वृंदा को भी इसकी अनुभूति न हो सकी..एक पूरी आयु उस सुनहरी-पीली आंच में तपती रही..सब स्वर्णमयी..सब प्रेममयी..
पीली ही हो चली देह भी... मन भी..धरती पर सूरज का हर फेरा.. शनः शनः एक तरुणी 'वृंदा' को 'वृद्धा' मे रूपांतरित करता रहा.. किसी ध्यानमग्न साध्वी सी वृंदा वहीं ..उस पाषाण खंड पर बैठी स्वयं पाषाण सी हो चली..उसी प्रेम में जलते-सिकते हुए एक दिन वो देह भी प्रकृति में विलीन हो गयी…
किसी का होना और न होना बहुत अर्थपूर्ण होता है...हम होते हैं तो स्वयं को उपेक्षित सा अनुभव करते हैं..लगता है जैसे किसी के ध्यान में ही नही हमारा अस्तिव..परंतु कौन जाने...हमारे न होने पर ये फूल पत्ते…वर्षा की बूंदें ..धरती -आकाश सब हमारी स्मृतियों में विह्वल हो,.हमे खोजते हों..
कदाचित प्रकृति को भी वह अनुरागिनी वृंदा अपने ही किसी हिस्से सी लगी हो...जिसकी रिक्तता उसे उद्वेलित कर रही हो...
जिस स्थान पर वृंदा देह से मुक्त हुई...वहां स्वतः ही एक नन्हा
अप्रतिबंधित समर्पित प्रेम के पर्याय से ये सूरजमुखी के फूल आज भी अपने मुस्काने से मुरझाने तक सूरज को अपलक निहार कर निहाल रहते हैं..सूरज की दिशा ही जिनकी दृष्टि का निर्धारण करती है….. जिनके रूप में वृंदा चिर प्रतीक्षारत है..उसी निर्मोही..निर्मम सूरज के लिए…
इस क्षण जब मैं ये लिख रही हूँ ...सूरजमुखी का मर्म फिर मुझे छू रहा है….भूपिंदर सिंह द्वारा गाया गया ये गीत फिर कहीं अंतर में गूंज रहा है..
" सूरजमुखी..तेरा प्यार अनोखा है…
हर सुबह को खिलना है…
हर शाम को मुरझाना है…
सूरज ने क्या तेरे ...इस मर्म को जाना है…."
और मैं विवश सी हूँ…स्वयं के भीतर उगते सूरज और सिर उठाते सूरजमुखी को अभिव्यक्त होने देने के लिए….






एक परिपक्व साहित्यकार का लेखन अदभुत एंव सुंदर..
ReplyDeleteसाधुवाद..🙏🌹
आपका आभार....🙂🙏🙏💐
Deleteअति सुंदर भाव अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ma'am🙂💐🙏
Deleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति , नंदन, वृंदा सूरजमुखी सब बहुत अच्छा ❤️❤️
ReplyDelete😇😇🤗🤗🤗शुक्रिया दीदी... आपने पढ़ा...🙂🙂🙂🙏
ReplyDeleteAapki abhivyakti se mujhe yaad aaya ki maine apni abhivyakti ko prakat karne ke liye ek Monthly Magazine nikalna shuru kiya tha jiska baam Maine "Abhivyakti" rakkha tha ...aapki lekhni kidi bhi paripakva lekhika se kum nahi ..waise is Brinda ki kahani saayad Maine bhi suna ya padha tha ..aapne sab milakar bemisal likha ...bohot anand ki anubhuti hui padh kar ..Keep writing and keep on sharing .
ReplyDeleteजी समीर जी ..आपकी अभिव्यक्ति-क्षमता का आभास है मुझे भी...फिर से लिखना शुरू करें यदि ...तो ज़रूर साझा कीजियेगा..आपको पढ़ने की उत्सुकता रहेगी...आपने इतने स्नेह से पढ़ा और अपनी इतनी सुंदरता से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की... सूरजमुखी का तेज और बढ़ गया....बहुत आभारी हूँ🙂🙏💐
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